मय रोटी हरव, कहूं कर गोल, कहूं कर चौकोर, कहूं कर पतली |

मय रोटी हरव, कहूं कर गोल, कहूं कर चौकोर, कहूं कर पतली, त कहूं कर मोटी हव, मोरे पहिया मा चढ़ के मनखे पुरा करथे जिनगी के सफर ल, मय बना देथ... thumbnail 1 summary
मय रोटी हरव, कहूं कर गोल,
कहूं कर चौकोर, कहूं कर पतली,
त कहूं कर मोटी हव,
मोरे पहिया मा चढ़ के मनखे पुरा करथे जिनगी के सफर ल,
मय बना देथो मइनखे ल का से का.
कभू मदारी, कभू शिकारी,
उछलत रहिथे बेंदरा कस,
नाचथे भालु कस.
रेंग पडथे आगी मा.
बैठ जथे बरफ के गोला मा,
मय बड किस्मत ले मिलथो,
अमीर के महफिल मा मोर मान कम हे,
फेर गरीब बर मिही हिम्मत हरो,
मोर बर मइनखे कुछू भी कर सकथे.
कोन्हो ल मार देथे, भीख घलो मांगथे,
चोरी डकैती करे मा शरम नई हे,
मय अमीर गरीब दोनो बर मीठ हो,
ऐ मोर अपमान कराइया,
जेकर भरे हे भेट ओला नेवता देवइया.
आज मगरूर हस तोर पेट भरे हे तब,
जा देख झोपड़ी म चलके,
मोर एक टुकडा के कई हिस्सा होथे,
ये छत्तीसगढ़ मा लाखों भुखमरी के शिकार हे,
मय सबले सम्मान के हकदार हो,
जब मइनखे मोर ले छक जथे,
तब सोंचथे आजादी बर,
अपन हक बर, अविष्कर करे बर,
अपन आत्मा बर, परमात्मा बर.
कभू कभू मय भगवान ले बड के होथो....!!